प्रकृति प्रार्थना गीत के बोल हिंदी में
सृष्टिकर्ता ! परम आत्मा ! शन्ति दे और प्यार दें ।थक जाता है जब मेरा मन, ठिठुरता है जाड़े मे। (1)
पेड़ पल्लवित जैसे होता है, उष्ण पवन के झोंके में ।मुझे भी वैसे पास रखकर, अपने प्रकाश में बढ़ने दे।(2) अपनी ऊर्जा भरते हो प्रभु, धरती के हर कोने में । वैसे ही उष्ण पवन बहा दे, मेरी भी छोटी सिने में।(3)
जीवन का जाल बुना है तुमने, मैं तो उसका एक धागा हुं।इसकी क्षती कि अगर तो, अपना ही क्षती करता हूँ। (4)
व्याख्या
“अंतर्यामी”, “अंतर–पुरुष“,“जीवन वृक्ष”, “आंतरिक झरना”, “सबसे गहरा बिंदु ही उच्चतम बिंदु है, जो छठी इंद्रिय को जागृत करता है।“
(1&2). बाहर की ओर देखने से , मुझे तूफान और मुश्किलें दिखाई देती हैं।“आप मुझमें बसे हो “, अपने अंदर झांकने से, मुझे शांति और प्रेम का अनुभव प्रदान होता है।
(1 & 2). “मेरी आत्मा प्रकृति में विश्राम करती है और यह पृथ्वी पर रहने वाले सभी लोगों के लिए आपका उपहार है।“
“और मुझे उस टिमटिमाती रोशनी में परम उष्णता का अनुभव होता है।
“प्रकृति के वास्तविक, अनछुए स्वरूप से संभव नहीं है । क्योंकि यह परमात्मा का निवास स्थान है और
जीवन की सांस और स्रोत है।“
प्रकृति जितनी अधिक सुरक्षित/संरक्षित रहेंगे, उतनी ही अधिक आंतरिक यात्रा हो सकेगी और आपके प्रकाश व सत्य में बढ़ सकेंगे, आपके प्रेम द्वारा पोषित होकर, और आपके ज्ञान से जागृत व प्रबुद्ध हो कर।“
(3) “आप” संपूर्ण ब्रह्मांड और हर आत्मा को अपनी प्रेरणा से भर देते हैं। जैसे–जैसे कोई आत्मा, अपने भीतर के ‘परम आत्मा‘ के करीब होती है, वास्तव में अपने हृदय में आपकी प्रेमपूर्ण और शांतिपूर्ण उपस्थिति का अनुभव होता है।“
(4) “और जब ‘मेरी आत्मा भीतर की ओर यात्रा (अन्तर्यात्रा) “करती है“, तब मुझे आपके स्पर्श का अनुभव होता है और यह भी महसूस होता है कि बाहर सब कुछ आप क बुना हुआ जीवन का जाल है, हे परमात्मा!! सर्वोच्च सत्ता।“
“मेरी आत्मा “आपसे” जुड़ गई है और मुझे यह अहसास हो रहा है कि मेरा कार्य जीवन के जाल मैं बस एक भूमिका निभाना है। और मुझे इस जाल का सम्मान करने की आवश्यकता है।“
एक सामंजस्यपूर्ण जाल तभी बनता है जब धागे आपस में जुड़े या परस्पर जुड़े होते हैं, लेकिन एक अकेला धागा जाल नहीं बना सकता।
और जितना अधिक आत्मा “आपसे” जुड़ है, मेरा सच्चा स्वरूप प्रकट होता है और सत्य बन जाता है।
इसलिए मैं किसी के प्रति झूठा होने में असमर्थ हूं और मैं स्वयं के प्रति सच्चा रहता/ रहती हूं ।
“मेरे चारों ओर हर वस्तु/प्राणी में ‘सर्वोच्च सत्ता / “परमात्मा” का वास है, और मैं जीवन के हर रूप का सम्मानित करना मेरा कर्म है ।“
“मन, वचन या कर्म से किसी मनुष्य या जीव को ठेस पहुँचाकर, मैं स्वयं को ही चोट पहुँचा रहा/रही हूँ और यह (जीवन के) जाल को तोड़ता है।“
एक आसक्ति
आसक्ति वह अवस्था है, जो इस गलत धारणा
से उत्पन्न होती है कि कोई चीज या कोई व्यक्ति,
आपकी खुशी के लिए आवश्यक है। यह किसी चीज
को पाने की तीव्र इच्छा या लालसा है, और जिस क्षण
हम उसे पा लेते हैं, हम उसके वश में हो जाते हैं।
दुनिया में व्यवहार करने का एक गलत तरीका और
दुख, पीड़ा और चिंता की ओर ले जाने वाला द्वार हैं।
यह आत्म–छवि के साथ एक गलत पहचान है।
“प्रकृति के वास्तविक, अनछुए स्वरूप से आसक्ति
संभव नहीं है। क्योंकि यह परमात्मा का निवास स्थान
है और जीवन की सांस और स्रोत है।“
“प्रकृति के वास्तविक, अनछुए स्वरूप से आसक्ति संभव नहीं है। क्योंकि यह परमात्मा का निवास स्थान है और जीवन की सांस और स्रोत है।“

नमस्ते – मैं प्रत्येक मनुष्य में विद्यमान आपकी परमात्मा उपस्थिति का सम्मान करता/ करती हूँ ।“